बलूचिस्तान
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बलूच विद्रोहियों के हमलों ने सरकार और सेना दोनों की स्थिति को बेहद कमजोर कर दिया है। बलूच विद्रोहियों ने बलूचिस्तान के 12 अलग-अलग स्थानों पर सुरक्षा बलों, पुलिस और नागरिक बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर हमले किए, जिनमें कम से कम 10 सुरक्षाकर्मी मारे गए। इन घटनाओं से प्रांत में सुरक्षा स्थिति गंभीर बनी हुई है। मुख्यमंत्री सरफराज बुगती इन हमलों के बाद सार्वजनिक रूप से बहुत व्यथित नजर आए। इन हमलों के बाद बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) द्वारा जारी की गई दो हमलावरों की तस्वीरें काफी चर्चा में रहीं। इन तस्वीरों में दोनों हमलावर महिलाएं थीं। यह बात इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि सशस्त्र उग्रवाद को लंबे समय से पुरुष-प्रधान गतिविधि के रूप में देखा जाता रहा है।
समाज के भीतर गुस्सा
विश्लेषकों के अनुसार, बलूच प्रतिरोध आंदोलन अब पारंपरिक जनजातीय ढांचे से आगे बढ़कर सामाजिक और रणनीतिक बदलाव के दौर से गुजर रहा है। उनका कहना है कि पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान की सख्त कार्रवाइयों, जबरन गुमशुदगियों और राजनीतिक संवाद की कमी ने स्थानीय लोगों में असंतोष को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषक आयशा सिद्दीका का मानना है कि किसी विद्रोह में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी उस समाज के भीतर गहरे गुस्से और टूटते सामाजिक ढांचे की ओर इशारा करती है।
हाल के दिनों में हुए हमलों में कुल 50 नागरिकों और 17 सुरक्षाकर्मियों की मौत के बाद बीएलए ने दो महिला हमलावरों की पहचान जाहिर की। इनमें से एक की पहचान 24 वर्षीय आसिफा मेंगल के रूप में हुई है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी पुष्टि की कि कम से कम दो हमलों में महिला उग्रवादियों की भूमिका रही। बीएलए के अनुसार, आसिफा मेंगल ने जनवरी 2024 में फिदायीन हमले का फैसला किया था और नुश्की में एक हमला अंजाम दिया।
इसी बीच सोशल मीडिया पर बीएलए से जुड़ी एक महिला लड़ाके का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वह हथियारों से लैस होकर सुरक्षा प्रतिष्ठानों के आसपास गतिविधियां करती दिख रही थी। वीडियो में उसके साथ पुरुष लड़ाके भी नजर आए, जो पाकिस्तानी सरकार और सुरक्षा बलों पर तंज कसते दिखे।
बलूच महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी
दरअसल, हाल के वर्षों में बलूच महिलाओं की सशस्त्र संगठनों में भागीदारी लगातार बढ़ रही है। हालांकि यह पहला मौका नहीं है जब महिला आत्मघाती हमलावर सामने आई हों। वर्ष 2022 में कराची विश्वविद्यालय के कन्फ्यूशियस इंस्टीट्यूट के बाहर हुए हमले में पहली बार एक महिला फिदायीन की भूमिका सामने आई थी, जिसमें तीन चीनी नागरिकों सहित चार लोगों की मौत हुई थी। इसके बाद जून 2022 और मार्च 2025 में भी बलूचिस्तान में महिला उग्रवादियों द्वारा हमलों की घटनाएं दर्ज हुईं। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, इन घटनाओं ने पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों को और जटिल बना दिया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जैसे-जैसे बलूच आंदोलन का नेतृत्व जनजातीय सरदारों से हटकर शिक्षित मध्यम वर्ग की ओर बढ़ा, वैसे-वैसे महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ी। वॉइस फॉर बलूच मिसिंग पर्सन्स के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद से 5000 से अधिक लोग लापता हुए हैं, जिनमें ज्यादातर पुरुष हैं। ऐसे में कई परिवारों में महिलाओं ने सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध की जिम्मेदारी उठाई है।
रणनीतिक मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी ने इंडिया टुडे से बातचीत में कहा कि महिला उग्रवादियों की बढ़ती भूमिका बलूच समाज में गहरी निराशा और हताशा को दर्शाती है। वहीं, पाकिस्तानी सत्ता के करीबी कुछ विश्लेषक इसे सशक्तिकरण के बजाय संगठित शोषण बताते हैं और आरोप लगाते हैं कि उग्रवादी संगठन युवा महिलाओं को भावनात्मक और वैचारिक दबाव में भर्ती कर रहे हैं।
पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती
सुरक्षा आंकड़ों की बात करें तो 2011 के बाद से बलूच उग्रवाद से जुड़े हमलों में पाकिस्तान में कम से कम 350 लोगों की जान जा चुकी है। वर्ष 2024 और 2025 में संघर्ष से जुड़ी मौतों में तेज इजाफा हुआ है, जिससे सुरक्षा बलों पर दबाव और बढ़ गया है। विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में बलूचिस्तान में उग्रवाद की दिशा और उसमें महिलाओं की बढ़ती भूमिका पाकिस्तान के लिए एक बड़ी रणनीतिक तथा राजनीतिक चुनौती बनती जा रही है।

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