धार
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर को लेकर चल रही कानूनी जंग में अब एक नया अध्याय जुड़ गया है। अब तक यह विवाद मुख्य रूप से हिंदू और मुस्लिम पक्षों के बीच था, लेकिन अब जैन समाज ने भी इस पर अपना दावा पेश किया है। इंदौर हाईकोर्ट की बेंच के सामने याचिकाकर्ता सालेक चंद जैन की ओर से दलील दी गई कि इस स्मारक का गहरा संबंध जैन परंपराओं से भी है।
वाग्देवी नहीं, जैन यक्षिणी अंबिका की मूर्ति
जैन समाज की ओर से पेश वकील दिनेश राजभर ने हाईकोर्ट में सबसे बड़ा तर्क 'वाग्देवी' की उस मूर्ति को लेकर दिया, जो फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती की प्रतिमा बताता है, लेकिन जैन पक्ष का दावा है कि यह असल में जैन यक्षिणी अंबिका की मूर्ति है। राजभर ने तर्क दिया कि मूर्ति पर बने नक्काशीदार तीर्थंकरों के चित्र स्पष्ट रूप से जैन प्रतिमा विज्ञान का हिस्सा हैं, जो सरस्वती की हिंदू प्रतिमाओं में नहीं पाए जाते। उन्होंने कहा, 'चूंकि जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों को माना जाता है, इसलिए उनके चिन्ह जैन देवी-देवताओं की मूर्तियों पर मिलते हैं।'
2003 के ASI आदेश को चुनौती
याचिका में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के साल 2003 के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके तहत वर्तमान में व्यवस्था चल रही है। फिलहाल:
मंगलवार: हिंदुओं को पूजा और बसंत पंचमी पर विशेष आयोजन की अनुमति है।
शुक्रवार: मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की इजाजत है।
जैन पक्ष का कहना है कि जब इस स्थल का ऐतिहासिक संबंध जैन धर्म से भी है, तो उन्हें पूजा के अधिकारों से वंचित क्यों रखा गया है?
राजा भोज और जैन विद्वान
अदालत में यह भी दलील दी गई कि परमार राजा भोज न केवल विद्या के प्रेमी थे, बल्कि उन्होंने जैन विद्वानों और परंपराओं को भी पूरा संरक्षण दिया था। याचिका में 1882 की एक सरकारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि भोजशाला के कुछ गुंबद और खंभे राजस्थान के मशहूर माउंट आबू के दिलवाड़ा जैन मंदिरों की शैली से मिलते-जुलते हैं।
भोजशाला असल में एक जैन गुरुकुल और मंदिर था। एएसआई की सर्वे रिपोर्ट केवल हिंदू और मुस्लिम एंगल पर केंद्रित रही है, जबकि वहां मौजूद जैन प्रतीकों और साक्ष्यों को नजरअंदाज कर दिया गया।
ASI की भूमिका पर सवाल
जैन पक्ष ने एएसआई के सर्वे पर भी सवाल उठाए। उन्होंने तर्क दिया कि एएसआई का काम केवल वहां मिली चीजों का दस्तावेजीकरण करना था, न कि किसी स्थल को धार्मिक स्वामित्व सौंपना। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत जैन श्रद्धालुओं को भी वहां पूजा का अधिकार मिलना चाहिए। मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।
राजा भोज ने दान दी थी जमीन, ब्रिटिश लंदन ले गए थे वागदेवी की प्रतिमा
मामले में एडवोकेट प्रिया जैन ने बताया कि इतिहास में मुगलों ने जैन मंदिर को तोड़कर ही अपने धार्मिक स्थान बनाए हैं. धार भोजशाला के राजा भोज थे, जिनके यहां हमारे आचार्य रहकर शिक्षा-दीक्षा लेते थे. जिससे खुश होकर राजा भोज ने धार भोजशाला वाली जमीन उन्हें दान में दी थी. उस समय वहां पर गुरुकुल हुआ करता था, धार भोजशाल में उस समय जैन आचार्य द्वारा मां सरस्वती और अंबिका देवी की प्रतिमा स्थापित की गई थी. उस समय वो मूर्तियां ब्रिटिशों द्वारा लंदन ले जाईं गई थी. जो वहां के म्यूजियम में आज भी मौजूद है और शिलालेख द्वारा सुरक्षित है. शिलालेख में सारी बातें स्पष्ट लिखी है, कि 1034 ई. में यह वागदेवी की प्रतिमा है. जिसके साक्ष्य हमने कोर्ट में पेश किए हैं।
धार भोजशाला में जैन के चिन्ह मौजूद, वागदेवी देवी अंबिका की प्रतिमा
एडवोकेट प्रिया जैन ने बताया कि हमारे जैन समाज के जो 24 तीर्थंकर होते हैं, उन्हें चिन्हों के द्वारा पहचाना जाता है. वो सारे चिन्ह और साक्ष्य धार भोजशाला में मौजूद हैं. चिन्ह से ही हमारे भगवान की पहचान होती है और जो वागदेवी की मूर्ति है, यह हमारे तीर्थकरों के आसपास रहती थी. इससे जुड़े सारे साक्ष्य हमारे पास मौजूद हैं, जो हमने कोर्ट के सामने पेश किए है।
बताते चलें कि जैन समाज ने एएसआई के 2003 के उस आदेश को भी चुनौती दी है, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिमों को शुक्रवार नमाज को नमाज की अनुमति दी गई थी. जैन समाज ने इसे संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत उल्लंघन बताया है।
वहीं एमपी सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह दलीलें दी. उन्होंने कोर्ट से सामने बताया कि अनुच्छेद 226 के तहत होईकोर्ट को व्यापक अधिकार प्राप्त है. राइट टू वर्शिप के आधार पर यह याचिका सुनवाई योग्य है. इसके साथ ही प्रशांत सिंह ने ASI की सर्वे रिपोर्ट का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि सर्वे के दौरान मिले शिलालेख और दूसरे साक्ष्य यह बताते हैं कि यहां पहले मंदिर था, जिसकी जगह पर बाद में मस्जिद बनाई गई. बता दें धार भोजशाला मामले को लेकर 6 अप्रैल 2026 से इंदौर हाईकोर्ट में रोज सुनवाई हो रही है. जिसे हाईकोर्ट के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच द्वारा सुना जा रहा है. अब आगे की सुनवाई गुरुवार दोपहर को होगी.

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