बिलासपुर
हाईकोर्ट ने गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रशासन को आदेश दिया है कि नियमित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को 15 दिनों के भीतर नियमित पद के अनुरूप वेतन दिया जाए। यह मामला लंबे समय से चल रहे नियमितीकरण विवाद और पूर्व आदेशों के पालन नहीं होने को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं का है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बिभू दत्ता गुरु की एकलपीठ में हुई।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि वर्ष 2023 में हाईकोर्ट द्वारा आदेश पारित किए जाने के बावजूद विश्वविद्यालय प्रशासन ने कर्मचारियों को नियमित कर्मचारियों के समान सभी लाभ अब तक नहीं दिए हैं। पक्षकारों ने कहा कि 6 मार्च 2023 के आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि संबंधित कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी माना जाएगा तथा उनकी सेवाओं का नियमितीकरण 26 अगस्त 2008 से प्रभावी समझा जाएगा। साथ ही उन्हें नियमित कर्मचारियों के बराबर सभी सुविधाएं और लाभ भी दिए जाने थे।
हाईकोर्ट में अवमानना याचिका पर निर्देश
जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों को न तो नियमित किया गया है और न ही देयकों का पेमेंट किया गया है। जिसके खिलाफ कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में न्यायालय की अवमानना याचिका दायर की है।
सुप्रीम कोर्ट SLP और रिव्यू पीटीशन खारिज कर चुका
जानकारी के अनुसार, सेंट्रल यूनिवर्सिटी की ओर से दायर एसएलपी और रिव्यू पीटीशन सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। फिर भी अब तक नियमित कर्मचारियों की तहर दैनिभो कर्मियों को वेतन नहीं दिया जा रहा है।
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि, साल 2023 में पारित आदेश के बावजूद विश्वविद्यालय अब तक कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी के समान पूरा लाभ नहीं दे रहा है।
यूनिवर्सिटी ने जबाव में दी सफाई
मामले में यूनिवर्सिटी की ओर से वकील ने कोर्ट को बताया कि कर्मचारियों का नियमितीकरण कर दिया गया है, लेकिन कुछ दस्तावेजों के सत्यापन की प्रोसेस बाकी है। विश्वविद्यालय ने सफाई दी कि कर्मचारियों से आवश्यक दस्तावेज मांगे गए थे,जो उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे लाभ देने में देरी हो रही है।
इसके जवाब में याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि संबंधित आदेश और पत्राचार कर्मचारियों को उपलब्ध ही नहीं कराया गया था।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिए
दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि 27 अप्रैल 2026 का पत्राचार 12 मई तक सभी याचिकाकर्ताओं को उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद कर्मचारियों को एक हफ्ते के भीतर जरूरी दस्तावेज जमा करने होंगे।
हाईकोर्ट ने कहा- 15 दिन में नियमित पद का वेतन दिया जाए
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि यूनिवर्सिटी भले नियमितीकरण का दावा कर रही हो, लेकिन अब तक कर्मचारियों को नियमित पद का वेतन नहीं दिया जा रहा है। इस पर विवि की ओर से कहा गया कि दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया 15 दिनों में पूरी कर ली जाएगी और जो कर्मचारी नियमित पद पर कार्यरत हैं, उन्हें नियमित पद के अनुसार वेतन दिया जाएगा।
हाईकोर्ट ने इस यूनिवर्सिटी के पक्षकार वकीलों के इस बयान को रिकॉर्ड पर लिया और कहा कि नियमित कर्मचारी के रूप में कार्य कर रहे याचिकाकर्ताओं को 15 दिनों के भीतर नियमित पद का वेतन भुगतान किया जाए।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि विश्वविद्यालय द्वारा इस आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका और पुनर्विचार याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट पहले ही खारिज कर चुकी है। इसके बावजूद कर्मचारियों को पूरा लाभ नहीं मिल पाया।
दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से कहा गया कि कर्मचारियों से आवश्यक दस्तावेज मांगे गए थे, लेकिन दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं कराए जाने के कारण प्रक्रिया में देरी हुई। इस पर दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय को निर्देश दिया कि 27 अप्रैल 2026 का पत्र सभी याचिकाकर्ताओं को 12 मई तक उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद कर्मचारी एक सप्ताह के भीतर जरूरी दस्तावेज जमा करेंगे।
सुनवाई के दौरान कर्मचारियों ने यह मुद्दा भी उठाया कि विश्वविद्यालय नियमितीकरण का दावा तो कर रहा है, लेकिन उन्हें अब भी नियमित पद के अनुरूप वेतन नहीं दिया जा रहा। इस पर विश्वविद्यालय ने अदालत को भरोसा दिलाया कि दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया 15 दिनों के भीतर पूरी कर ली जाएगी और नियमित पदों पर कार्यरत कर्मचारियों को उसी अनुरूप वेतन दिया जाएगा।
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए स्पष्ट कर दिया कि जो कर्मचारी नियमित पदों पर कार्य कर रहे हैं, उन्हें 15 दिनों के भीतर नियमित वेतनमान का लाभ दिया जाना अनिवार्य होगा।

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