नई दिल्ली
असम में विधानसभा चुनाव अभियान के बीच पाला बदल से अब तक हलकान रही कांग्रेस को राज्य में गठबंधन को स्वरूप देने में मिली कामयाबी ने चुनाव में मुकाबले की नई उम्मीद दी है।
राज्य के उपरी से लेकर पहाड़ी क्षेत्र में आधार रखने वाली छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन की इस पहल के साथ ही कांग्रेस ने असम की सत्ताधारी भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के लिए चुनौती बढ़ा दी है।असम में कांग्रेस का गठबंधन रायजोर दल तथा असम जातीय परिषद समेत छह दलों के इस गठबंधन के सहारे कांग्रेस अब खास तौर पर उपरी असम की अधिकांश विधानसभा सीटों पर भाजपा की चुनावी रफ्तार को थाम लेने की उम्मीद कर रही है।
असम में कांग्रेस की अगुवाई में बने नए चुनावी गठबंधन में सामाजिक कार्यकर्ता अखिल गोगोई के रायजोर दल और लुरिन गोगोई की पार्टी एजेपी के अलावा, आल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस, माकपा और सीपीआई(एमएल) शामिल हैं। असम प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगाई के अनुसार कांग्रेस जहां करीब 100 सीटों पर उम्मीदवार उतार रही है। वहीं रायजोर दल 11, एजेपी 10 तथा अन्य दल दो-दो सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।
लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों के बाद असम में अपनी चुनावी संभावनाएं देख रही कांग्रेस को चुनाव से ठीक पहले उसके कई बड़े नेताओं ने पाला बदल तगड़े झटके दिए।
कांग्रेस ने चला दांव कभी कांग्रेस के प्रमुख नेता रहे अब राज्य में भाजपा के पोस्टर ब्वाय मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक सिंटिंग लोकसभा सदस्य समेत कांग्रेस के कई नेताओं को भाजपा में शामिल करा पार्टी की चुनावी नैया डांवाडोल कर दी थी। इस चुनौती से पार पाने के लिए ही कांग्रेस ने छोटे दलों के साथ सामाजिक-राजनीतिक समीकरण साध हिमंत की जवाबी घेरेबंदी का यह दांव चला है।
गौरव गोगोई ने गठबंधन के फैसले को सही ठहराते हुए इस ओर स्पष्ट इशारा करते हुए कहा कि कांग्रेस जैसी पार्टी के लिए सीटें छोड़ना आसान नहीं होता। लेकिन हाईकमान ने राज्य और उसके भविष्य के हित में इस पर हामी भरी है। सूबे की जमीनी हकीकतों को देखते हुए हमने गठबंधन किया है।
चुनावी राजनीति के लिहाज से असम की कुल 126 विधानसभा सीटों में से उपरी असम की 28 विधानसभा सीटों पर गठबंधन से फायदा मिलने की कांग्रेस की उम्मीद बढ़ गई है। खास बात यह है कि गौरव गोगोई, लुरिन गोगोई और अखिल गोगोई तीनों सूबे में प्रभावी अहोम समुदाय से आते हैं और इससे जुड़ी भावनाएं बलवती हुई तो विपक्षी खेमे को फायदा पहुंचा सकती है जिसका नुकसान उपरी असम में भाजपा को उठाना पड़ सकता है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी इसका प्रभाव देखने को मिला, जब अहोम भावना के कारण ही हिमंत के तमाम प्रयासों के बावजूद गौरव गोगोई जोरहाट से चुनाव जीत गए। वैसे भाजपा पूर्वी असम के इलाकों में मजबूत मानी जाती है जहां सबसे अधिक सीटें हैं। लेकिन इस इलाके में भी अहोम एक प्रमुख समुदाय है और इसलिए विपक्षी खेमा यहां भी अब भाजपा को चुनौती देने की उम्मीद करने लगा है। असम के चुनाव अभियान में भाजपा और हिमंत पहले से ही इस इलाके में पूर्वी बंगाल से पलायन कर आई मुस्लिम आबादी से जनसांख्यिकीय बदलाव होने का मुद्दा उठाते हुए ध्रुवीकरण का आक्रामक सियासी दांव चल रहे हैं।
ऐसे में कांग्रेस उम्मीद कर रही कि छह विपक्षी दलों के अपने गठबंधन के सहारे अहोम फैक्टर के दम पर हिमंत के ध्रुवीकरण के इस दांव को थामा जा सकता है।

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