लखनऊ
योगी सरकार ने पिछले नौ वर्षों में हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में बड़े कदम उठाए हैं। आज प्रदेशवासियों को उनके ही जिले में गुणवत्तापूर्ण इलाज की सुविधा मिल रही है। योगी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि वर्तमान में जटिल प्रसव वाले मामलों को बड़े शहरों की ओर रेफर करने की प्रवृत्ति अब प्रदेश में कम हो रही है। छोटे शहरों में ही जटिल मामले संभाले जा रहे हैं। इसके साथ ही योगी सरकार ने 76 जिला अस्पतालों के 1,791 डाक्टरों को बीते चार वर्षों में प्रशिक्षण दिया।
आरआरटीसी मॉडल से जिलों में मजबूत हो रही मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाएं
उत्तर प्रदेश सहित देश के कई हिस्सों में मातृ एवं नवजात मृत्यु दर को कम करना आज भी स्वास्थ्य प्रणाली के सामने बड़ी चुनौती है। विशेषकर जिला और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ सेवाओं की कमी, आपात स्थितियों में त्वरित निर्णय की क्षमता का अभाव और समय पर रेफरल की जटिलताओं के कारण कई बार ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। इन्हीं सवालों का व्यावहारिक और प्रभावी उत्तर बनकर उभरा है रीजनल रिसोर्स एंड ट्रेनिंग सेंटर (आरआरटीसी) मॉडल। प्रदेश में इस वक्त 20 मेडिकल कॉलेज आरआरटीसी के रूप में काम कर रहे हैं।
आरआरटीसी मॉडल: प्रशिक्षण से आगे, एक “सिस्टम स्ट्रेंथनिंग इंजन”
आरआरटीसी ने पारंपरिक प्रशिक्षण मॉडल से आगे बढ़ते हुए हब-एंड-स्पोक आधारित मेंटरशिप मॉडल विकसित किया, जिसमें मेडिकल कॉलेज “नॉलेज हब” के रूप में कार्य करता है और जिले “स्पोक” के रूप में उससे निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। इस मॉडल के तहत ऑन-साइट मेंटरिंग, निरंतर क्षमता निर्माण, नर्सिंग स्टाफ का सशक्तीकरण व मल्टी-डिपार्टमेंट सहयोग लिया जाता है। अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज परिसर में स्थापित आरआरटीसी इस मॉडल की मिसाल है। यहां से अलीगढ़, हाथरस व कासगंज जिला अस्पताल के डॉक्टरों व स्टाफ की क्षमतावृद्धि की गई । आज वे जटिल से जटिल मामलों को संभाल रहे हैं। आरआरटीसी की को-ऑर्डिनेटर डॉ. तबस्सुम रहमत बताती हैं कि “हमारा लक्ष्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं, बल्कि हर स्वास्थ्य इकाई को इस स्तर तक सक्षम बनाना है कि वह जटिल परिस्थितियों का सामना आत्मविश्वास के साथ कर सके।”
जमीनी बदलाव: कासगंज से उभरती एक मिसाल
आरआरटीसी मॉडल का प्रभाव सबसे स्पष्ट रूप से कासगंज जिला महिला अस्पताल में देखा जा सकता है। वर्ष 2017 में जहां इस अस्पताल में पहला सफल सी-सेक्शन एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, वहीं आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। ऑपरेशन थिएटर पूरी तरह सुसज्जित और सक्रिय है। अधिकतर डॉक्टर और स्टाफ प्रशिक्षित हैं। जटिल प्रसव मामलों का स्थानीय स्तर पर ही प्रबंधन संभव हो रहा है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि पहले जिन मामलों को तत्काल बड़े शहरों में रेफर करना पड़ता था, अब उनमें से कई का इलाज जिले में ही हो रहा है। इससे न केवल समय की बचत हुई है, बल्कि माताओं और नवजातों के लिए जीवनरक्षक अंतर भी पैदा हुआ है।
संकट के समय भी निरंतरता: कोविड-19 के दौरान अनुकूलन
कोविड-19 महामारी के दौरान जब स्वास्थ्य सेवाओं पर अभूतपूर्व दबाव था, तब भी आरआरटीसी की पहल नहीं रुकी। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रशिक्षण जारी रखा गया, विशेष सत्र आयोजित किए गए, और यह सुनिश्चित किया गया कि संस्थागत प्रसव और नवजात देखभाल सेवाएं बाधित न हों। यह दर्शाता है कि यह मॉडल केवल स्थिर परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि संकट के समय भी अनुकूल और प्रभावी है।
एक केस, जो बताता है क्षमता का वास्तविक अर्थ
जेएन मेडिकल कालेज की डॉ. नसरीन नूर एक जटिल केस को याद करती हैं। 23 वर्षीय एक महिला तेज पेट दर्द के साथ आई। प्रारंभिक जांच में स्थिति सामान्य प्रतीत हो रही थी, लेकिन विस्तृत मूल्यांकन में हेटरोटॉपिक प्रेग्नेंसी का पता चला। एक गर्भाशय में और दूसरा ट्यूब में, जिसमें से ट्यूब वाली प्रेग्नेंसी फट चुकी थी। तत्काल सर्जरी कर मरीज की जान बचाई गई। सावधानीपूर्वक फॉलोअप के बाद उसी महिला ने नौ महीने बाद एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। यह केवल एक सफल केस नहीं, बल्कि यह संकेत है कि अब प्रणाली जटिल और जीवन-जोखिम वाली स्थितियों को पहचानने और संभालने में सक्षम हो रही है।

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